साहित्यकार और लेखक बड़ी मशाकत से तर्क और संदेह को जीवित रखते है

आज सारी पुरानी परिभाषाएँ बेमानी बेकार हो गई हैं। जिंदगी जीने का तरीका खुद तय करने का युग आ गया है। संसार को किसी और की निगाह से देखने वाली पीढ़ी जा चुकी है या जाने के लिए तैयार है। यह सारा बदलाव इतनी तेजी से हुआ कि गांधी जी के तीन बंदर कब जोकरों की कतार में खड़े हो गए पता ही नहीं चला। आज बुरा देखने, बुरा बोलने और बुरा सुनने का हौसला ही जीवन का सच्चा मंत्र हो गया है। अगर हम बुरा देखने से बचेंगे तो बुरा होने से कुछ भी रुकेगा कैसे। आँख बंद कर लेने भर से तो अपनी तरफ आता तीर अपना रास्ता तो नहीं बदलेगा। उस तीर को रोकने के लिए उसे देखना पड़ेगा। वो भी चौकन्ना रह कर। इसी तरह बुरा बोलना एक कला है आज। अगर आप साफ-साफ कोई बात नहीं कह देते तो कई बातें लगातार और बुरी होती जाती हैं। इसलिए बुरा बोलने वालो को रोकने के लिए उतना ही बुरा बन जाना कत्तई बुरा नहीं है। अब रही बात बुरा सुनने की। जब अनेक विचार या कुविचार एक साथ आपके आस-पास तैर रहे हों तब आप बुरा सुनने से कैसे बच सकते हैं। कान में अंगुली  डाल ले या कान ही कटवा लें तो भी बुरा तो सुनना पड़ेगा। आज सुनाने के अनेक दूसरे तरीके आ गए हैं। समाज अपनी कठिन और क्रूर बातें भी दूसरे तरीकों से सीधे आप के मन तक पहुँचा ही देता इसलिए बुरा सुनों और सोचो कि इस बुरे का क्या उचित उत्तर हो सकता है। अगर बुरी बात को गौर से सुनेंगे तो यकीन मानो उसका कोई न कोई वाजिब जवाब पक्का दे पाओगे आप । वो उत्तर बुरा और कड़ा भी हो सकता है। अब आप कड़ा और बुरा उत्तर देकर एक बुरी बात को रोकना बेहतर समझते हैं कि बुरा बोलने वाले को सुधारने में सालों साल शांति और धैर्य के साथ उस बुरी बात को झेलना पसंद करेंगे। आप खुद ही यह तय करें।

ऐसी अनेक पुरानी बातें और विचार हैं जिनको आज के युग के अनुसार या तो अपने जीवन से बेदखल करना होगा या उनको बदल कर अपनी सुविधा के अनुसार करना होगा। मैं धैर्य के साथ सहने से अधिक धैर्य के साथ संघर्ष को महत्व देने की बात कर रहा हूँ। पुरानी मान्यताओं और बातों से सबसे अधिक संघर्ष लेखक करता है। लेखक अपनी सोच से हर बात को एक नया अर्थ देता है। कई बार एक लेखक एक बेहद पुरानी बात को नए सिरे से रेखांकित करता है। साहिर लुधियानवी ने जब पहली बार ताजमहल को अपनी निगाह से देखा तो ताजमहल का अर्थ प्रेम के प्रतीक की जगह गरीबों की मोहब्बत का मजाक उड़ाने वाले प्रतीक के रूप में सामने आया। जब उन्होंने यह लिखा कि-

एक शहंशाह ने बनवा के हंसी ताजमहल

हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक

मेरी जान कहीं और मिला कर मुझसे।

इसी तरह लगभग ढाई हजार साल पहले महात्मा गौतम बुद्ध ने जब कहा कि संदेह करो। हर एक बात पर संदेह करो।  प्रश्न करो कि कोई बात क्यों बिना तर्क के मान ली जाए। तो उन्होंने श्रद्धा की तगह तर्क को महत्व दिया। संदेह करने और प्रश्न करने से जो समाज हिचकेगा यह तय है कि वह प्रगति और विकास की दौड़ में बहुत दूर तक नहीं दौड़ पाएगा। बड़े से बड़ा महंत हो या बड़े से बड़ा ज्ञानी किसी की बात आँख मूंद कर मान लेना बहुत बड़ी नादानी है। गांठ बांध लें संदेह और प्रश्न तो करना ही है। प्रश्न न करने वाला समाज हमेशा मिट रहा समाज होता है। तो अपने पुरखे बुद्ध की बात बुद्धि में रखें और संदेह के साथ प्रश्न करना एक आदत बना लें। जो कोई आपके प्रश्नों का बुरा मानता है तो गांधी के तीनों बंदरों को भी याद रखें । लेकिन आप आँख न बंद करें। कान न बंद करें। मुंह न बंद करें। पुरानी पीढियों से वह सब लें जो आवश्यक लगे। परम्परा के बोझ को नहीं पुराने अनुभव को मित्र बनाएँ। पुराने उद्धरणों को नोट करें लेकिन आँखें बंद करके नहीं बल्कि दिमाग की हर बत्ती जला कर पुरानी बातों को परखें। और हर पुरानी बात के लिए अपनी एक नई परिभाषा गढ़ें। गढ़ने की कोशिश हमेशा कामयाब होती है।

लेकिन मैं खुद ही यह क्यों भूल जा रहा हूँ कि मेरी बातों को आप पूरी तरह मान ही लें यह जरूरी तो नहीं। यहाँ कही मेरी हर बात को अपने तर्क और विचार के तराजू पर तौलिए। बात में गहराई और अर्थ यानी कोई मीनिंग दिखे तो अप्लाई करिए नहीं तो अगली किसी महत्वपूर्ण बात को पाने की दिशा में बढ़ जाइए। मंगल होगा।

-डॉ. बोधिसत्व

नोट- इस टिप्पणी को प्रकाशित करने के लिए मैं श्री प्रदीप चक जी को हर प्रकार की अनुमति देता हूँ। वे इसे जहाँ जिस प्रकार प्रकाशित करना या कैसे भी उपयोग करना चाहें कर सकते हैं।